Monday, March 29, 2010

चलों शादी कर लेती हूँ

चलों शादी कर लेती हूँ ,
थोडा मनोरंजन हो जाएगा ॥
चलों नौकरी कर लेती हूँ ,
थोडा समय कट जाएगा॥
पर शादी नहीं करनी थी,
इसलिए तो नौकरी पकड़ी थी॥
अब नौकरी से त्रस्त हुई तो ,
शादी का ख्याल आजमाने चली॥
जिन्दगी जैसे हवा हो गई हैं ,
कभी पूरब से बहती है, कभी पश्चिम से॥
न कोई स्थिरता है, न कोई स्वरुप ,
और ना ही कोई अस्तित्व ही ॥
किधर जाना है, कुछ पता नहीं ,
क्या पाना है, कुछ भाता भी तो नही॥
अन्दर एक निर्वात-सा हैं ,
बाहर सबकुछ धूमिल॥
बस चलते हैं, सब चलते हैं जो
किसी मुकाम पे पहुचना है सबको ,
पर पहुँचकर भी क्या हो जाएगा ,
मुकाम अंत मे एक राह ही बन जाएगा॥
लोग फिर भी राह तो तय कर ही लेते हैं ,
पर अपनी जिन्दगी तो ऐसे ही हैं॥
चलों शादी कर लेती हूँ..........................

Friday, October 23, 2009

माँ..

माँ, तुझमे ही मेरी सारी दुनिया समायी,,,
बैचैन रातों मे, तेरी गोद मे ही नींद आई,,
अपने सारे सपने बेचकर,,
तू हमारे लिए बेसकिमती सपने ले आई,,
हमारी हर एक हसरत के लिए,
अपनी सारी चाहत भुलाई,,
अब मुम्किन तो नही की,,
तेरे सपने, चाहत, उम्र
कुछ भी लौटा दू,,
बस कोशिश करती हूँ,,
जो भी मेरे हाथो मे है,,
तेरी राहों मे बिछा दूँ...

Friday, February 13, 2009

एक ख्वाब था...

एक ख्वाब था जो
गलती से मेरे पलकों पे आ गया
मैंने अनजाने, अपना समझकर
उसे दिल मे बैठा लिया
उसको अपना बनाने की धुन मे
सारे ख्वाबो से रिश्ता बिगार लिया
पर परवाह किसको थी,
जब अपना जहाँ
उस एक
ख्वाब से ही
मुकम्मल-सा लगने लगा ...

रात आती रही, जाती रही
ख्वाब वैसे ही लेटा रहा
और मै उसके बगल मे बैठी रही
वो मुझे चाँद से
मिलवाने ले जाता
और आते वक्त
चाँद के बाग़ से
कुछ सितारे तोड़कर
मेरी जुल्फों मे लगा देता
मै चुपके से उसे
कम्बल ओढा देती
धुप उसकी आंखों मे चुभे
इसलिए सारे परदे गिरा देती...

एक रोज सोयी तो,
ख्वाब कहीं भी न दिखा
पानी, धरती, आसमां मे ढूंढा
हवा, खुशबू, चाँद से पूछा
पर कहीं उसका निशां मिला
मै भी पगली
कहाँ
ख्वाब से दिल लगा बैठी
जब होश आया तो देखा
नींद मे ही सबकुछ गवा बैठी ...

एक अरसा हुआ, उसे गये हुए
पर अब भी एक तारा है जो
मेरी जुल्फों मे फसा रह गया है
एक आश है जो
निराशा की भीड़ मे
मेरे दामन से चिपकी पड़ी है
एक बार वो
ख्वाब
दो पल को ही दिख जाए
उसके जाने का सबब नही पुछुगी
ही उससे पाने-खोने का कोई हिसाब मागुंगी
बस इस तारे और आश को लौटाकर
कुछ पल चैन से सोने की तमन्ना है...

Saturday, February 7, 2009

वक्त...

वक्त चलता रहता है,
बदलता रहता है
वक्त के साथ लोग भी चलना सिख जाते है,
बदलना सिख जाते है
मै भी शायद चल रही हूँ,
या शायद रुक गई हूँ
बदलने की कोशिश मे शायद थक गई हूँ
वक्त उन्ही का अच्छा साथ देता है,
जो वक्त के साथ चलते है
पर मै तो पीछे रह गई हूँ,शायद बहुत पीछे
मुझे भी आगे बढ़ना है ओरों की तरह,
मुझे भी बदलना है ओरों की तरह
दिल की तो आदत है,
कहीं लग जाता है तो बस लग जाता है,
पर अब वक्त नही इसके सुनने-सुनाने की
काश ऐसा कोई रास्ता होता,
जहाँ
दिल को भी खुशी-खुशी ले जा पाती,

पर रास्ते तो दिमाग के लिए ही बनते है,
और दिमागवाले ही उसपर ठीक से चलते है
मुझे भी अब तेज़ी से बढ़ना होगा,
चाहे इसके लिए अपनी ही भावनाओ से लड़ना होगा
कोशिश है ,वक्त के पास पहुँच पाँऊ,
कोशिश नही मझे ऐसा करना ही होगा
क्यूंकि यही सही है, और सिर्फ़ यही सही होगा