Sunday, December 28, 2008

ये साल ...


कुछ दिनों का बस ये साल अब मेहमान रहा,
बाँध दो जल्दी से जो भी इसका सामान रहा...

इसके
साथ बिताये लम्हे याद बहुत तो आयेंगे,
वो
खुशियाँ, वो गम... कहाँ हम इतनी जल्दी भूल पाएंगे...

नए
साल से फ़िर से एक रिश्ता नया बनाना होगा,
इससे
एक वादा करके फिरसे उसे निभाना होगा...
इस साल के फूलों से अगले साल को महकाना होगा,
इस साल के काँटों को अपने दामन से हटाना होगा...

पुराने
रंग पे एक नया रंग फ़िर से चढाना होगा,
टूटे रिश्तों को स्टोर रूम में कहीं छिपाना होगा...

दुःख
के गीतों को भूलकर खुशियों के गीत गाना होगा,
दिल के अंधेरे कमरों में आशा की नई ज्योत जलाना होगा...

अपने
सारे यादों को पिछली सारी धुल लिपटी यादों के बीच लगाना होगा,
टूटे
-बिखरे ख्याबो को कुरे में डाल, नए ख्याबो को फ़िर से घर लाना होगा...



Friday, December 26, 2008

अंतर्मन



आज दिल ने चाहा सबकुछ भूलकर, सोचु अपने को अपने बाहर को नही बल्कि अपने अन्दर को, जो कभी स्थिर पानी से भी ज्यादा शांत रहता है,,जब मेरे बाहर हर तरफ़ शोर-ही-शोर होता है पर जिसमे कभी-कभी समुन्द्र से भी ज्यादा भयानक तूफान उठते है,,जिसे महसूस करती हूँ जब रहती हूँ तन्हा आज सोचा उससे पुछ ही लु, की तुम चाहते क्या हो ?? मै दुबारा पूछती हूँ ,आख़िर तुम चाहते क्या हो??? पर फ़िर से मेरी आवाज जैसे पर्वतो से टकराकर वापस मुझ तक ही लौट आती है ऐसा लगता है मानो , मेरा अन्दर मेरा सवाल मुझसे ही पुछता हो उसका मौन मुझसे कुछ कहकर भी बहुत कुछ कहता हो वह मुझे समझाता है या मै उसे ? कुछ समझ नही आता पर कही से आवाज आती है की , मै हर रिश्ते को बांधना चाहती हूँ, अनंत काल के लिए और यही मेरी परेशानी की एकमात्र वजह है क्यूंकि सबकुछ हमेशा के लिए नही होता और जब तक होता है, तब भी डरी रहती हूँ खोने के डर से और जब खो जाता है , तो बैठी रहती हूँ पाने की आश मे ये जानते हुए की जो चला गया है, उसका आना अब सम्भव नही ये एहसास ऐसा होता है ,जैसे अपने किसी प्रियजन की मौत के बाद हम उसके आने की आश कर रहे हो रिश्ते भी तो एक बार मर जाते है तो , उनका उसी रूप मे वापस आना सम्भव नही होता और जो रिश्ते आज आपके साथ है वो हमेशा ऐसे ही रहेंगे ये भी जरुरी नही ये मेरा अन्दर जानता है पर मानता नही और जबतक मानेगा नही ,तब तक मै यु ही परेशान रहूंगी,,अन्दर-ही -अन्दर...

Thursday, December 25, 2008

प्यार का फ़साना ...


कॉफी के कुछ प्यालो के लिए, 
न तुमने मुझे बुलाया होता,
न मै यु ही चली आती,
न तुमने बात बढाया होता...

बारिश के उन दिनों मे,
न तुमने अपना छाता छिपाया होता,
न मै तुम्हे अपनी छतरी मे बुलाती,
न तुमने पास आकर मुझे अन्दर तक भिंगाया होता...

गुलाब का वो फूल,
न तुमने मेरे किताब मे छुपाया होता,
न मै उसे देखकर मुस्कुराती,
न तुमने अपना हाले-दिल बताया होता...

पहारो की उन वादियों मे,
न तुमने मुझे अकेले बुलाया होता,
न मै तुम्हारे कांधे पे सर रखती,
न तुमने अपने प्यार का भरोशा दिलाया होता...

न तुमने मुझे प्यार करना सिखाया होता,
न मैंने तुम्हारा साथ चाहा होता,
इस तरह ता-जिन्दगी इंतज़ार क समुन्द्र मे,
छोड़ जाने से तो बेहतर था की ,
तुमने एहसासों का कोई रिश्ता ही न बनाया होता...

और बनाना ही था,
तो जाने से पहले,
अपने यादों के हर एक कतरे को,
दूर ले जाकर दफनाया होता...

Wednesday, December 24, 2008

Jab bhi akeli hoti hun..


Jab bhi akeli hoti hun,
khud ko dhudhne nikal jati hun...

Hath me kalam lekar,
khud hi raste banati hun...

Jin Raston ka manzil se n ho wasta,
unpr dil ko le jakar bahlati hun...

khayalo ke nadi k kinare baithkr,
khamoshi k geet gungunati hun...

Jab kabhi bahut se sawalo se ghir jati hun,
bematlab sa koi sawal dudh lati hun...

Aankhon ko band karke ek khyab naya sajati hun,
andheron k ghar me jakar apne sare sawal rakh aati hun...