Saturday, January 17, 2009

पापी रात...

रात बदनसीब-सी दबे पाव चली आई है,,
अपने साथ पापो की गठरी उठा लायी है

जब सारा जग सो रहा है गहरी नींद मे,,
क्यों मुझको ही अपना दुखरा सुनाने आई है

जाकर इन यादों को कही दफना क्यों नही आती,,
अपने साथ मुझे भी निजाद क्यों नही दिलाती

जिनकी यादों को ये नासमझ ढोए जा रही है,,
उसने तो बस बेवफाई ही वफ़ा से निभाई है

जिस वक्त मौका आया हाथ बढ़ाने का,,
उसने जोर से एक और ठोकर लगाये है॥

अब दीवानी को कैसे समझायुं,ऐसे तू जी नही पायेगी,,
जितना इनको संजोयेगी,उतना ख़ुद को चोट पहुचायेगी

दिल के घाव को तो अब तक भरने दिया,,
अब क्या रात जगाकर, आँखों से भी खून उतरवाएगी


ऐसा कोई...

वो जो सपनो को सजा दे...
वो जो ओरों को भुला दे...

वो
जो जज्बातों को जुबान दे...

वो जो होठों को मुस्कान दे...

वो
जो सफर को सुहाना बना दे...

वो जो बिन किए वादें निभा दे...

वो
जो मेरा होना लाजमी है बता दे...

वो जो खुदा और किस्मत पे भरोशा दिला दे...

वो
जो मेरे दिल के गुलशन को खिला दे...

वो जो सपनो को हकीक़त से मिला दे...

ऐ मन ...


कब तक यूँही मुझे तरपायेगा 'मन',,,
मुझे परेशां करके तू क्या पायेगा 'मन'...

मै तो ऐसे भी दर्द की मारी हूँ,,,
मुझे और चोट पहुचाकर ,
तुझे क्या मिल जाएगा 'मन'...

उजाले तो रूठे है मुझसे,,,
अब क्या अंधेरों को भी मेरा दुश्मन बनाएगा....

ख्याब तो टूटे है मुझसे,,,
अब क्या ग़लतफ़हमी भी दूर करवाएगा...

कब तक यूँही मुझे तरपायेगा 'मन',,,
मुझे परेशां करके तू क्या पायेगा 'मन'...

मुस्कुराये हुए एक अरसा हुआ,,,
अब क्या आंसू भी गिरवायेगा...

मंजिल तो गुम हो चुके,,,
अब क्या रास्तों पे भी कांटे बिछ्वायेगा...

कब तक यूँही मुझे तरपायेगा 'मन',,,
मुझे परेशां करके तू क्या पायेगा 'मन'...

ख़ुद से परेशां...

उलझनों को जब सुलझाती हूँ,,,
और ज्यादा उलझ जाती हूँ...

ख़ुद ही गलतियाँ दुहराती हूँ,,,
पर ओरो को समझाती हूँ...

परछाईयो को रोकती हूँ,,,
बेमाने रिश्तों को जोगती हूँ...

नींदों से शायद खफा-सी हूँ,,
ख़ुद से शायद जुदा-सी हूँ...

जिन्दगी का रंग समझती नही,,,
रास्तों पे संभलकर चलती नही...

बदलते वक्त को देखकर हैरान-सी
हूँ,,,
अपनी लापरवाही से परेशान-सी हूँ...